पहला रत्न है - माफी।
तुम्हारे लिए कोई कुछ भी कहे, तुम उसकी बात को कभी भी अपने मन में न बिठाना, और ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखना, बल्कि उसे माफ कर देना।
दूसरा रत्न है - भूल जाना।
अपने द्वारा दूसरों के प्रति किए गए उपकार को भूल जाना, और कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखना।
तीसरा रत्न है - विश्वास।
हमेशा अपनी मेहनत और उस परम-पिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना, क्योंकि हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं, जब तक उस सृष्टि नियंता के विधान में नहीं लिखा होगा। परम-पिता परमात्मा पर रखा गया विश्वास ही तुम्हें जीवन के हर संकट से बचा पाएगा और सफल करेगा।
चौथा रत्न है - वैराग्य।
हमेशा यह याद रखना कि जब हमारा जन्म हुआ है तो निश्चित ही हमें एक दिन मरना है। इसलिए किसी के लिए भी अपने मन में लोभ-मोह न रखना मेरे बच्चों।
जब तक तुम ये चारों रत्न अपने पास संभालकर रखोगे, तुम खुश और प्रसन्न रहोगे।

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