अहंकार

शास्त्रों में निपुण, प्रसिद्ध ज्ञानी एवं प्रख्यात संत श्री देवाचार्य जी के एक शिष्य का नाम महेन्द्रनाथ था। एक शाम महेन्द्रनाथ अपने साथियों के साथ उद्यान में टहल रहे थे और आपस में वे किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। चर्चा का विषय था- स्वर्ग और नर्क।


किसी एक साथी ने महेन्द्रनाथ से पूछा- क्यों मित्र, क्या मैं स्वर्ग जाऊंगा?


महेन्द्रनाथ ने उत्तर देते हुए कहा- जब मैं जाएगा, तभी आप स्वर्ग जाओगे।


उस साथी ने सोचा, कि महेन्द्रनाथ को अभिमान हो गया है और फिर सारे साथियों ने मिलकर महेन्द्रनाथ की शिकायत अपने गुरु श्री देवाचार्य जी से कर दी।


श्री देवाचार्य जी को पता था कि उनका शिष्य महेन्द्रनाथ न केवल निरहंकारी है बल्कि अल्प शब्दों में गंभीर ज्ञान की बातें बोलने वाला भी है। उन्होंने महेन्द्रनाथ को बुलाकर इस घटना के बारे में पूछा, और उसने अपना सिर हिलाकर इस बात की पुष्टि की। अन्य शिष्यों में इस घटना को देखने के बाद कानाफूसी शुरू हो गई।


श्री देवाचार्य जी ने मुस्कुराते हुए दोबारा वही प्रश्न पूछा- अच्छा ये बताओ महेन्द्रनाथ, क्या तुम स्वर्ग जाओगे?


महेन्द्रनाथ ने कहा- गुरुदेव, जब मैं जाएगा, तभी तो मैं स्वर्ग जा पाऊंगा।


श्री देवाचार्य जी बाकी शिष्यों को समझाते हुए बोले- शिष्यों, इनके कहने का मतलब है, जब मैं जाएगा, यानि जब अहंकार जाएगा, तभी तो हम स्वर्ग के अधिकारी बन पाएंगे। जब-जब आपके मन में ये बातें आएंगी कि मैंने ऐसा किया, मैंने इतने पुन्य किए और मैंने सब किया, उस स्थिति में स्वर्ग के बारे में सोचना भी गलत है।


सभी शिष्यों को अपनी गलती का एहसास हो गया और फिर सबने गुरु जी से क्षमा मांगी और आदरपूर्वक महेन्द्रनाथ जी की तरफ देखा।


------ तात्पर्य ------

अहंकार हमें कहीं का भी नहीं छोड़ता है। ये इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। ये ना तो हमें दुनियावी कार्यों में आगे बढ़ने देता है और ना ही ये हमें परमार्थ के रास्ते पर चलने देता है।

इस अहंकार से बचने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है, कि जब कभी भी हमें गुस्सा आए, हमें चुपचाप शांत हो जाना चाहिए। बस, यही इसका एकमात्र ईलाज है।

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