शांत रहो

एक सत्संग में महात्मा जी समझा रहे थे- तुम परमात्मा द्वारा दी गई विपत्ति से इतने दु:खी नहीं हो, जितना तुम अपने कर्ताभाव और ममता से दुःखी हो। लेकिन तुम अज्ञान के कारण परमात्मा को दोषी मानते हो और जिस परिस्थिती में तुम दु:खी होते हो, ज्ञानी उसी परिस्थिती में दु:खी क्यों नहीं होता, क्योंकि उसने कर्ताभाव से और भक्ताभाव से मुक्ती प्राप्त कर ली है।

अपने मनुष्य शरीर की, समय की, गुरू की और ज्ञान की कदर करो, छोटी -छोटी बातों पर झगड़ा करके अपना समय और अपने आनंद को मत गंवाओ। किसी के साथ भी दिमाग मत खपाओ और बात-बात पर किच-किच मत करो। हर बात को, जाने दो, करना सीखो। संसार इतना महत्वपूर्ण नहीं है जो तुम इसके लिए अपनी शांति को गंवा देते हो।

तुम गाड़ी से कहीं जा रहे हो और रास्ते में एक गाड़ी मिली जो बहुत धुआं छोड़ रही है, तो तुम्हारे पास तीन विकल्प हैं-

पहला, तुम गाड़ी के साथ चलो

दूसरा, तुम उस गाड़ी के पीछे-पीछे चलो

और तीसरा- तुम उस गाड़ी को पीछे छोड़कर आगे निकल जाओ

समझदार आदमी गाड़ी के साथ चलकर धुआं नहीं खाएगा, ना ही गाड़ी के पीछे-पीछे चलकर अपना मन जलाएगा, बल्कि वो अपनी गाड़ी उस गाड़ी से आगे निकालकर धुएं से मुक्त हो जाएगा।

तुम झगड़ा करने वाले, गलत वायब्रेशन वाले या धुआं छोड़ने वाले के साथ क्यों चलते हो, उसका पीछा भी क्यों करते हो, बल्कि ऐसे लोगों को बहुत पीछे छोड़ दो।

गलत व्यक्तियों को सुधारने के चक्कर में मत पड़ो। वो तो सुधरेंगे नहीं, बल्कि तुम्हें और अशांत कर देंगे।

सत्संग में जीने की कला मिलती है।

राजा जनक के पास कोई कर के रूप में नकली मुद्रा दे गया। राजा ने उस मुद्रा को जमीन में गड़वा दिया ताकि कोई उसे देख ही न पाए।

गंदगी को फैलाने से अच्छा है कि उसे जमीन में दबाकर बात को समाप्त कर दो।

तुम भी गलत लोगों को और उनकी बातों को दफना दो, और यदि तुम्हें कोई ठग भी ले तो भी ये सोचकर शांत रहो कि कोई पुराना हिसाब होगा चुकता हो गया।

पैसे की बात पर तो खिटखिट बिल्कुल भी मत करो। जीवन बहुत अनमोल है, इसे बिना कीमत की कौड़ियों के बदले में मत लुटाओ।

संसार में बहुत चालाकी से यदि बहुत कुछ जोड़ भी लिया, तो करोगा क्या, सब कुछ यहां छोड़कर ही जाना है। सामान छूट जाएगा, लेकिन किया हुआ गलत कर्म, क्रियमान कर्म बनकर सदा साथ चलेगा और अपना फल देकर ही समाप्त होगा।

------ कबीरा आप ठगाइए, और ना ठगे कोए ------

------ आप ठगे सुख होत है, और ठगे दु:ख होए ------


सत्संग से बाहर निकलते हुए सभी श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं और चेहरे पर एक दृढ़ विश्वास था कि आज जो कुछ भी महात्मा जी ने समझाया है, उस पर हम हर हाल में अमल करेंगे।

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