भगवान विष्णु जी ने जवाब दिया- नारद जी, मेरी कृपा को समझना बड़ा कठिन है।
इतना कहकर भगवान विष्णु जी, नारद जी के साथ साधु भेष में पृथ्वी पर पधारे और फिर एक सेठ के घर भिक्षा मांगने के लिए दरवाजा खटखटाने लगे।
सेठ गुस्से में बिगड़ता हुआ दरवाजे की तरफ आया और देखा तो दो साधु खड़े हैं।
भगवान विष्णु जी बोले- हमें बड़े जोरों की भूख लगी है, थोड़ा सा खाना मिल जाए तो आपकी मेहरबानी होगी।
सेठ बिगड़कर बोला- तुम दोनों को शर्म नहीं आती, तुम्हारे बाप का माल है क्या? कर्म करके खाने में शर्म आती है क्या? जाओ-जाओ, किसी होटल से खाना मांगना।
नारद जी बोले- देखा प्रभु, यह आपके भक्तों और आपका निरादर करने वाला सुखी प्राणी है। इसको अभी शाप दीजिए।
नारद जी की बात सुनते ही भगवान विष्णु जी ने उस सेठ को और अधिक धन-संपत्ति बढ़ाने वाला वरदान दे दिया।
इसके बाद भगवान विष्णु जी, नारद जी को लेकर एक बुढ़िया माता के घर में गए, जिसकी एक छोटी सी झोपड़ी थी और जिसमें एक गाय के अलावा और कुछ भी नहीं था।
जैसे ही भगवान विष्णु जी ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई, बुढ़िया माता बड़ी खुशी के साथ बाहर आई। फिर उसने दोनों साधुओं को आसन देकर बिठाया और उनके पीने के लिए दूध लेकर आई और बोली- महात्मा जी, मेरे पास और कुछ भी नहीं है, आप इसे ही स्वीकार कीजिए।
दोनों ने बड़े ही प्रेम से उस बुढ़िया माता का आदर-सत्कार और दूध स्वीकार किया।
तब नारद जी ने भगवान विष्णु जी से कहा- प्रभु, देखिए आपके भक्तों की इस संसार में कैसी दुर्दशा है। मेरे से तो देखी नहीं जाती। यह बेचारी बुढ़िया माता आपका भजन करती है और अतिथि सत्कार भी करती है, आप इसको कोई अच्छा सा आशीर्वाद दीजिए।
भगवान विष्णु जी ने थोड़ा सोचकर उस बुढ़िया माता की गाय को मरने का अभिशाप दे डाला।
यह सुनकर नारद जी बिगड़ गए और बोले- प्रभु, यह आपने क्या किया?
तब भगवान विष्णु जी ने कहा- नारद जी, यह बुढ़िया माता मेरा बहुत भजन और सिमरन करती है। कुछ दिनों में इसकी मृत्यु हो जाएगी और मरते समय इसको अपनी गाय की चिंता सताएगी, कि मेरे मरने के बाद मेरी गाय को कोई कसाई न ले जाकर काट दे, या पता नहीं, मेरे मरने के बाद इसको कौन देखेगा, वगैरह-वगैरह। तब इस माता को मरते समय मेरा स्मरण न होकर सिर्फ गाय की चिंता ही रहेगी और फिर वो मेरे धाम को न जाकर गाय की योनि में चली जाएगी।
उधर सेठ को और अधिक धन-संपत्ति बढ़ाने वाला वरदान दिया, ताकि मरते वक्त वो धन तथा तिजोरी का ध्यान करेगा और फिर वो तिजोरी के नीचे ही सांप बनेगा।
------ तात्पर्य ------
प्रकृति का नियम है, कि जीव का जिस चीज में भी अति लगाव रहेगा, वो जीव मरने के बाद वही जन्म लेता है और फिर बहुत दुख भोगता है। अतः हमें अपना चिंतन और ध्यान, सिर्फ और सिर्फ अपने गुरु की तरफ ही अधिक से अधिक रखना चाहिए, ताकि इस जन्म और मृत्यु से हमारा छुटकारा हो जाए और फिर हम हमेशा के लिए अपने परमात्मा के चरणों में पहुंच जाएं, जो सिर्फ और सिर्फ एक गुरु के द्वारा ही संभव है।
इसीलिए भक्त गरीब नहीं होते हैं, बल्कि उनसे अमीर ना तो कोई होता है और ना ही कोई और हो सकता है।
(स्रोत: मुफ्त में उपलब्ध जन साहित्य)

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