महात्मा जी अपने सत्संग में समझा रहे थे-
याद रखो- तुम अकेले आए हो और अकेले ही जाओगे। यहां की न तो कोई चीज तुम्हारे साथ जाएगी और न ही कोई आत्मीय या स्वजन ही साथ जाएगा।
याद रखो- आज घर में तुम्हारी बड़ी आवश्यकता है, और तुम भी ऐसा मानते हो कि मुझसे ही सारा काम चलता है और मेरे न रहने पर सब काम कैसे चलेगा। पर याद रखो कि तुम्हारे मरते ही कोई न कोई व्यवस्था हो जाएगी और कुछ दिनों बाद तो तुम्हारे अभाव का स्मरण भी नहीं होगा।
याद रखो- जैसे आज तुम अपने पिता, दादा और परदादा आदि को भूल गए हो और अपनी स्थिति में मस्त हो, वैसे ही तुम्हारी संतान भी तुम्हें भूल जाएगी।
याद रखो- तुम व्यर्थ में ही आसक्ति तथा ममता के जाल में फंस रहे हो और मानव जीवन के असली ध्येय को भूलकर, जिससे एक दिन सारे संबंध छूट जाएंगे और कभी उनकी याद भी नहीं आएगी, उसी में मन को फंसाकर जीवन को अधोगति की ओर ले जा रहे हो।
याद रखो- तुम पहले कहीं थे ही, वहां तुम्हारे माता, पिता, घर, पत्नी और पुत्र आदि भी होंगे ही, आज तुम्हें जैसे उनकी याद ही नहीं है कि वे किस हालत में हैं और कहां है, और इसका पता लगाने की भी कभी चिंता मन में नहीं होती, वैसे ही यहां से चले जाने पर दूसरे जन्म में यहां के सब कुछ भूल जाओगे।
याद रखो- जब तक तुम यह सोचते रहोगे कि अमुक परिस्थिति आने पर ही परमात्मा का भजन-सिमरन करूंगा, तब तक भजन-सिमरन बनेगा ही नहीं, परिस्थिति की कल्पना बदलती रहेगी। अगर तुम जिस परिस्थिति में हो और उसी में भजन-सिमरन आरंभ कर दो, तो भजन-सिमरन होने लगने पर परिस्थिति भी अपने आप ही उसके अनुकूल हो जाएगी।
याद रखो- मानव जीवन अजगरों की भाति लंबे काल तक नहीं रहता। फिर इस समय तो बालक तथा तरुण भी सहसा मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। अतएव बुढ़ापे की प्रतीक्षा न करके तुरंत भजन-सिमरन में लग जाओ। यदि यह अवसर हाथ से निकल गया तो फिर पीछे सिवा पछताने के और कोई भी उपाय नहीं रह जाएगा।
याद रखो- परमात्मा ने तुम पर कृपा करके इस संसार सागर से तरने और परमात्मा का प्रेम प्राप्त करने के सारे साधन सुलभ कर दिए हैं। इन साधनों को पाकर भी यदि तुम असावधान रहोगे और इनसे लाभ नहीं उठाओगे, तो तुम्हारे सामान मूर्ख और कौन होगा?
------ तात्पर्य ------
अब महात्मा जी की ऊपर समझाई बातों को सोचना, समझना और उन पर अमल तो हमें खुद ही करना है।
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