एक दिन मौज में आकर मुर्शिद ने उस खोजी को दीक्षा दे दी और अपना शागिर्द बना लिया और हिदायत दी- बेटा, हर रोज बिना नागा भजन-सुमिरन करना है।
कुछ समय बाद उस शागिर्द का ध्यान पक्का हो गया। अब मुर्शिद ने उसे वापिस घर भेज दिया। घर आकर वो शागिर्द अपने परिवार सहित छुट्टियां मनाने के लिए विदेश चला गया और वहां उसका भजन-सुमिरन छूट गया।
मुर्शिद ये सब देख रहा था। फिर एक दिन जब वो शागिर्द वापिस अपने घर लौटा तो उसका मुर्शिद भी काफी फकीरी और मायूसी की हालत में वहां पहुंचा।
वो शागिर्द अपने मुर्शिद की ऐसी हालत देखकर परेशान हो गया और पूछा- गुरु जी, यह कैसे?
मुर्शिद ने इश्क भरी निगाहों से कहा- बेटा, मोहब्बत में छुट्टियां नहीं होती। मैं तो हर रोज तुम्हारी राह देखता था, मगर तुमने मुझे याद ही नहीं किया और तुम्हारे इश्क की चाहत ने मेरा यह हाल बना दिया।
शागिर्द अपने मुर्शिद के पैरों पर गिर पड़ा और बोला- मेरे रहनुमा, मुझे माफ कर दीजिए।
और फिर वो शागिर्द अंदरूनी उस मुकाम पर पहुंचा, जिसकी उसे तलाश थी।
------ तात्पर्य ------
अगर हम अपने सत्गुरु से प्रेम करते हैं, तो सत्गुरु हमें हमारे प्रेम से भी बहुत अधिक प्रेम करते हैं। अगर हम अपने सत्गुरु को हर समय स्वस्थ और प्रसन्न देखना चाहते हैं, तो हमें बिना नागा भजन-सुमिरन करना ही पड़ेगा।
(स्रोत: मुफ्त में उपलब्ध जन साहित्य)

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