------ पर निर्भर है ------
हमें कोई छोटा-मोटा दुख भी आ जाता है, तो हम रोते हैं, प्रार्थनाएं करते हैं और मन्नतें करते हैं, कि हे भगवान! मुझे इस दु:ख से उबारो तो मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा, नारियल चढ़ाऊंगा, कन्याओं को भोजन कराऊंगा, कन्याओं को मीठा खिलाऊंगा या गरीबों को दान करूंगा वगैरह-वगैरह।
बस! इतना सा ही विश्वास है हमें अपने ईश्वर पर, अपने मालिक (परमात्मा) पर, अपने भगवान पर, अपने सत्गुरु पर या अपने दाता दयाल पर।
अरे, हमें क्या पता था कि कितनी बड़ी पहाड़ जैसी मुसीबत आने वाली थी हम पर, जिसको हमारे सत्गुरु जी ने एक छोटे से राई के दाने जितनी मुसीबत में तब्दील कर दिया और हाथी जितनी मुसीबत को चींटी जितना बना दिया।
विश्वास बहुत बड़ी चीज होती है, और फिर हमें अपने कर्मों का लेखा-जोखा भी तो खत्म करना है ना। विश्वास को बिल्कुल भी डगमगाने नहीं देना है। उस परवरदिगार को सब खबर है कि हमारे साथ क्या और क्यूं हो रहा है। फिर हम ये सोचने वाले होते ही कौन हैं कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों हो रहा है। जबकि हमारे साथ खुद तीनो जहान के मालिक, हमारे सत्गुरु, इन्सान के रूप में खड़े हैं।
जरूरत है अटूट विश्वास की, अटूट आस्था की, अटूट सिमरन की झड़ी की, फिर देखिए हमारी समझ को कैसे समझ आ जाएगी।
हम शिकायत करते हैं कि गुलाब की झाड़ियों में कांटे हैं, या फिर हम ऐसे भी खुश हो सकते हैं कि कांटो की झाड़ियों में गुलाब है, हमारी खुशी हमारी सोच पर ही निर्भर है।
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