जिस नाम रिदै सो सभ ते ऊंचा - श्री गुरु अर्जुन देव जी

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भृगि के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि यह एक छोटे से बिल में अंडा देती है। फिर यह अपने लार्वे के लिए कोई कीड़ा ढूंढ़ लाती है। उस कीड़े को लार्वे के सामने रखकर बिल बंद कर देती है। भृगि बिल के बाहर घू-घू करती रहती है। जब लार्वा बड़ा हो जाता है तो दोनों बिल तोड़कर बाहर आ जाते हैं।


इस बात से यह धारणा बन गई है कि भृगि अपनी घू-घू की तेज आवाज से दूसरी जाति के किसी कीड़े को भृगि ही बना लेती है। भृगि बिल में कैद कीड़े को अपनी तवज्जो देती है। अगर कीड़ा वह तवज्जो लेता है तो वो कीड़ा भी भृगि बन जाता है, और फिर दोनों भृगि बिल से बाहर निकलकर उड़ जाते हैं।


कबीर साहिब इसी बात को इस प्रकार प्रकट करते हैं-

------ सुमिरन से मन लाइए‌ ------

------ जैसे कीट भिरंग ------

------ कबीर बिसरै आपको ------

------ होय जाय तेहि रंग ------

अर्थात- इसी प्रकार अगर हम भी परमात्मा के नाम का ध्यान करेंगे तो हम उसमें समा जाएंगे। जिसके अंदर परमात्मा का प्रकाश प्रकट हो जाता है, वह उस प्रकाश का ही रूप हो जाता है। जिसका भी कोई लगातार ध्यान करता है, उसी का रूप बन जाता है।

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